Thursday, December 29, 2011

!! सजनवा की याद !!

सजी साँवरिया, ओढ़े चुनरिया,
अँखियन मे कजरा डाले,
हाथन मे कंगना डाले,
पैरन मे, पायलिया डाले,
दहलीज़ पे नज़रिया डाले,

बैठी है,
सजनवा की बाट देखे है,
नैनन मे अपने सपने देखे है,
मुखमंडल पे मुस्कान देखे है,
बस पिया मिलन की राह देखे है,

कितने साल निकल गये,
कितने मौसम चले गये,

अब के सावन, सतरंगी कर दे,

अब की बार, मुझे हारियली कर दे,

अब की बार आजा, सजनवा,
बस अब की बार, बस अब की बार !


__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__

Saturday, December 17, 2011

!! दर्द मे शायरी !!

हम अगर दर्द मे भी, कुछ कहते हैं,

उनको हर दर्द मे शायरी नज़र आती है,

हम दर्द से करहाते हैं,

वो खड़े हो कर तालिया बजाते हैं,

अपना दर्द किस से कहें,

जिसको भी सुनते हैं,

वही, वाह.. वाह... बहुत खूब कह कर,

बस आगे निकल जाते है___

__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__


Tuesday, November 15, 2011

!! तू मेरी आँखो का नूर है !!

तू मेरी आँखो का नूर है,
तू ही मेरे दिल का सकून है,
देखता हूँ जब आईने मे,
सामने तू खड़ी होती है,
जैसे मेरे पास मेरे करीब,
आने के लिए तू,
ये आईना अभी तोड़ देगी...

__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__

!! वक़्त ने डूबा दिया मुझको !!

वक़्त ने डूबा दिया मुझको,

कोई मंज़र, कोई सैलाब,

जैसे बहा ले गया मुझको,

अपने नज़र ना आए, कहीं,

हर नज़र डरा गयी मुझको,

हर किसी ने रुसवा किया,

हर किसी ने ठोकर मारी मुझको,

देखते रहो वो, खड़े खड़े,

बस रुलाके के चल दिए वो मुझको,

अपना कोई वज़ूद ना रहा,

बस यूही, वक़्त रुलाता रहा मुझको !


__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__

Thursday, November 10, 2011

!! तमन्ना चाह से है, मंजिले होसलो से है !!

तमन्ना चाह से है, मंजिले होसलो से है,

चाह और बुलंद होसला, ये बस हम से है,

रास्ता हम बनाएँगे आपका, बस साथ तुम से है,

हाथ थाम के चलो, सफ़र एक दूसरे से है,

अंजान राह सुहानी बनेगी,

बस एक कदम तुम से, तो अगला कदम हम से है,


__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__

!! तुझे हर वक़्त साथ अपने पता हूँ !!

तुझे हर वक़्त साथ अपने पता हूँ,

तेरी हर एक बात तो साथ लिए जाता हूँ,

तू यहीं पास है मेरे, जैसे तुझसे बातें किए जाता हूँ,

तेरे नयनो मे, बस मदहोश हुए मैं जाता हूँ !

बिखराकर का जोड़ना आता है हमे,

जब जब तेरे होटो को अपने हाथो से छूता हूँ,

सीहर सिहर तुम जाती हो,

तुम्हारी हर धकान मे,

अपने लिए एक अपनापन पता हूँ !____


__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__

Tuesday, November 8, 2011

!! हम आपकी परछाईयो मे भी खूबसूरत अहसास भर देंगे !!

नायक: पीछे पीछे चलूँगा, आप सोच लेना.
            अकेली चल रही हूँ,
            मैं सोचूँगा आप बस 2 कदम आगे हो,
            कम से कम साथ तो चल रहा हूँ आपके,
            आप आगे हो या साथ मे, क्या फ़र्क पड़ता है,

नायिका: हमे तो अपनी ही परच्छाई से भी डर लगता है ...

________________________________________

नायक :
हम आपकी परछाईयो मे भी खूबसूरत अहसास भर देंगे,

आपके..हर एक..एक..कदम पे..मादक..और..लुभावना..प्यार भर देंगे,

डूब जाओगी..इन अहसाहो मे,
आपके..हर अंग मे नशा ऐसा भर देंगे,

आपके रसीले होटो से टपकती शबनम की कसम,
आपके...होटो मे अपने अधरो का रस हम भर देंगे,

आपकी हर अंगड़ाई, हर परछाई मे हम,
अपनी बेकरारी ओर चाहत भर देंगे,

सो ना पाओगे, रात भर, हमारे बिना..
ऐसी आदत तुम्हारे अंदर भर देंगे,

आपके कोमल मरम्स्पर्शि गालो पे...
हम अपने होने की निशानी भर देंगे,

डूब जाओगे.. हमारी आँखो मे,
आपको नैनो मे मादक नशा हम भर देंगे,

हमारी एक एक छुवन से, पलके आपकी झुक जाएँगी,
ऐसी प्यार भरी पिचकारी, हम आपके अंदर भर देंगे,

खो ना जाना मेरी बातों मे,
आपको अपनी बाहों मे भर लेंगे,

____कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)____




Friday, November 4, 2011

!! तेरे नैनो मे रम गये मेरे नैन हैं !!

तेरे नैनो मे रम गये मेरे नैन हैं,
मानो यही ठहर से गये मेरे नैन है,

खो गया हूँ मैं पूरी तरह से,
मेरे सामने आपके नैन हैं,

मेरा अक्स नज़र आता है,
दर्पण बन गये आपके नैन हैं,

नैनो की बात नैनो से होने लगी,
बड़े ही मनभावन आपके नैन हैं,

अपने अधर से छूकर देखता हूँ,
बड़े ही नशीले आपके नैन है,

पलके उठती आपकी तो, नशा छा जाता,
मदिरा से भरे, मदहोश आपके नैन है,

आपका पूरा योवन महकता है,
इतने खूबसूरत, लुभावने आपके नैन है,

मेरे होटो पे मुस्कान, दिल मे अरमान है,
क्यो की मेरे सामने आपके, हसीन नैन हैं,

आपकी नज़रो की क्या बात,
बड़े की कातिल आकर्षित से आपके नैन है,

घायल भी आपके नैनो ने किया मुझे,
और अब उपचार भी आपके सुन्दर नैने हैं,

आप कुछ ना कहो, बस खो जाने दो मुझे,
मेरे सामने आपके नैन है.....

___कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___


Friday, October 21, 2011

!! प्रेम मे आकर्षित दो दिलो की बात है !!

प्रेम मे आकर्षित दो दिलो की बात है...

प्रेमी प्रेमिका के दिल की बात है....

प्रेम किसी के ज़ज्बात की बात है...

प्रेम एक सुंदर अहसास की बात है...

प्रेमिका की हर अंगड़ाई की बात है...

प्रेमिका की हर गहराई की बात है...

प्रेमिका द्वारा दी मोहब्बत की बात है...

प्रेमी के दिए अपने-पन की बात है....

प्रेमी प्रेमिका के आलिंगन की बात है....

दो जिस्म एक जान, वाहह अनोखी बात है....

प्रेमिका के होटो से टपकती शबनम की बात है.....

ये प्रेमी के अधरो द्वारा शबनम पीने की बात है....

प्रेमिका के नयनो से झलकती, शराब की बात है...

ये प्रेमी व प्रेमिका के मोहबत के नशे की बात है....

प्रेमिका के गरम सांसो की आने की बात है...

ये प्रेमी के बेताब दिल की धड़कन की बात है...

प्रेमिका के आँचल से आती तड़पन की बात है...

प्रेमी द्वारा प्यार भरे चुंबन की बरसात की बात है...

प्रेमिका की मदहोश होने बात है...

प्रेमी के प्यार भारी पिचकारी की बात है...

प्रेम रस मे डूबी नूर के दिल की बात है...

बड़े ही राज़ की बात है...

ये बस प्रेम और प्रेम केवल प्रेम की बात है...

ये अपने आप मे एक बात है...

की प्रेम करना एक सुंदर अहसास की बात है....


__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__




Thursday, October 20, 2011

!!भयानक काली रात, आपके प्यार का साथ!!

हर रोज की तरह साझ, ढली,
अंधेरे की चादर, धरा ने ओढ़ ली,
भयानक सी काली, अंधेरी रात मे,
मैं हूँ किसी अपने के इंतजार मे,
चारो ओर फैला सन्नाटा है,
एक अजीब सा डरावना अहसास है,
आँखे टिकी हैं, आँगन के फाटक पे,
तो कभी, टिकती हैं,
घर के अंदर जल रहे तेल के दीये पे,
वक़्त की गति, मानो यहीं थम सी गयी है,
अब मेरी चिंता, मानो बढ़ सी गयी हैं,
आकाश मे बिजली कडकने लगी है,
ये रात और, खोफ़नक होने लगी है,
तेज बरसात का शोर बढ़ने लगा हैं,
मुझे ओर ज़्यादा डर लगने लगा है,
अकेलेपन का अहसास होने लगा है,
घर मे जल रहे तेल के दिये का सहारा है,
अब दिये की रोशनी भी, किनारा कर रही है,
दिये ने साथ छोड़ दिया,
मुझे बेबस सा कर दिया,
अचानक फाटक खुलने की आवाज़ आई,
अपने किसी के आने की, महक सी आई,
आप आ गये हो,
मानो इस भयानक रात से,
अब कोई डर नही रहा,
मन मे खुशी का ठिकाना नही रहा,
आप से लिपटकर, कंधे पर सिर रखा,
भीगे शरीर से पानी,
जैसे मैने अपने शरीर मे सोख लिया हो,
आपके होटो से आ रही गरम सांस,
मेरे कानो मे आपके होने का अहसास दे रही है,
आपके आने से मानो,
ये काली, अंधेरी, भयानक रात,
मेरे लिए सुहवनी बन गयी है,
मैं सुरक्षित हूँ, आपके साथ हूँ,
मैं केवल ओर केवल तुम्हारी हूँ,
बस सदा मेरे आँचल मे,
आप मेरे करीब होने का अहसास देते रहो,
मैने हर लम्हा आपको,
चाहत से भी ज़्यादा चाहा है,

__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__



Thursday, September 22, 2011

!! आप की हर बात, अपने आप मे एक बात है !!

आप की हर बात, अपने आप मे एक बात है,
पढ़ता रहूं आपको, मेरे लिए बहुत बड़ी बात है!!
जिंदगी गुजार दूं, आपके शब्दो के साथ,
ये एक बड़े ही राज की बात है !!

___कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

!! एक ख़ास अहसाह नज़र आता है, आपकी आँखो मे !!

एक ख़ास अहसाह नज़र आता है, आपकी आँखो मे,
बस आपका ही इंतज़ार रहता है, हमारी आँखो मे !

तुम्हारा पर्तिबिम्ब नज़र आता है, देखो मेरी आँखो मे,
सारी खूबसूरती आप से है, बस, ठहर जाओ, मेरी आँखो मे !

एक अनदेखा सा, अहसास दिखता है, जब देखु आपकी आँखो मे,
आप मान मुझे जो इतना दे रहे हो, दिखाई देता है आपकी आँखो मे !

___कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

!! ना तू, इकरार करती ह, !ना तू इनकार ही करती है !!

ना तू हाँ करती है,
ना तू ना करती है!
तुझे ना समझ पाया कभी,
तू ये क्यो करती हैं!
उलझा हूँ, तेरी अदओ मे,
तू ऐसा क्या करती है!
कसक है तेरी, हर हरकत मे,
तू हमेशा, ऐसा ही करती है!
शबनम टपकती, तेरी, हर मुस्कान पे,
तू ये जानबूझकरम ऐसा करती है!
देख कर मुझे, अंगड़ाई लेती है,
मुझे देखकर ही तू, ये सब करती है!
तडपा कर रख दिया, तूने मुझे,
सच-सच बता, क्या तू, मुझसे प्यार करती है!!
ना तू, इकरार करती है,
ना तू इनकार ही करती है !!

____कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

Wednesday, September 21, 2011

!! रात, मैं तुम्हारे साथ था !!


रात भर, मैं सो ना पाया,
महसूस करता रहा,
तुम्हारी खूबसूरत, मनभावन, निर्मल काया !
तुम पास थी मेरे, 
कभी तुम मुस्कराती,
कभी तुम अपनी आँखें दिखती !
कभी तुम मुझसे बातें करती,
तो कभी, अचानक से, मेरे बालो को सहलाती!
कभी तुम मुझे छेड़ती,
तो कभी, अपनी अदा की छटा बिखेरती!
कभी तुम, अपने पैरो से, मेरे पैरो पे गुदगुदी करती,
तो कभी, अचानक से, अपने बालो से मेरा चेहरा ढक देती !
तुम मेरे कंधे पर, अपने आप को गिरा,
तो कभी, मेरे गले मे, अपनी बाहें डाल, झूल जाती! 
कभी तुम, अपनी अंगड़ाई से, मुझे पास बुलाती,
तो कभी, मुस्करा कर, मुझसे दूर भाग जाती!
कभी तुम, मेरे सीने पे अपना सिर रखती,
तो कभी, मेरे सीने पे अपने, अधर रख देती !
कभी, मेरी आँखो मे, अपनी आँखो डाल, देखती,
ती कभी, तुम्हारी पलके, कोमलता से शरमा जाती !
कभी तुम, मुझे अपने मदहोश आलिंगन मे बाँध लेती,
तो कभी, अपने मीठे अधरो का रस, मेरे होंठो मे भर देती!
कभी तुम, मेरी करवट के साथ, अपनी करवट लेती,
तो कभी, मेरा सिर पकड़, अपने आँचल पे रख देती !


तुम्हारा एक एक अंदाज, मुझमे चेतना भर रहा है,
सुबह हो चली है___ आज रात जल्दी ख़त्म हो गयी!
मैं उठने को हूँ, 
अचानक से तुमने मेरा हाथ पकड़ा, 
तुम्हारे मुख से निकला, रुक जाओ ना,
अभी तो आए थे, अभी चल दिए !


__दीपक पांचाल___

















Tuesday, September 20, 2011

!! हमारी चाहत की दुनिया मे, आपका स्वागत है !!



हुस्न-ए-आलिया__
हमारी चाहत की दुनिया मे, आपका स्वागत है !
ज़ोरदार तालियो के साथ, आपका स्वागत है !
पुलकित, हर्षित हृदय से, आपका स्वागत है !
स्वागत करता हूँ, आपकी मनमोहकता का,
आपकी खिलखिलाहट का भी स्वागत है !
चमेली की खुश्बू से, चंद्रमा की चाँदनी से,
पक्षियो के संगीत से, आपका स्वागत है !
आपके लुभावने रूप, रसीले अधर,
मदमस्त नैनो का, बार बार स्वागत है!
आपकी व्यसनी अंगड़ाई, घने गेसू,
इठलाती-बलखती लचकती, चाल का भी स्वागत है!
ऑश की नन्ही बूँदो से, महकते गुलाबो से,
सुरीली कोयल के गीतो से, आपका स्नेह भरा स्वागत है!
आपकी चूड़ियो की खनखनाहट, कजरे की बनावट,
झूमको का, पायल की छनछनाहट का, बार बार स्वागत है!
आपका बार बार स्वागत है, हर बार स्वागत है !
आपका ज़ोरदार, हार्दिक स्वागत है !
अपनी कलम की लेखनी से, आपका हार्दिक स्वागत है!!


___दीपक पांचाल___

Sunday, September 18, 2011

!! मृदु संगीत-स्वर् और सौन्दर्य का एक साथ संगम !!




मृदुला अधर से स्वर निकला तो, अचानक से अधीर हो गया था...
बजाया जब तूने साज़, संगीत मे विभोर हो गया था....
तेरे आकर्षक नैनन मे मदहोश हो कर डूब गया था...
तेरे मनमोहक मुख को निहार कर मंत्रमुग्ध हो गया था..
तेरे लुभावने अधर को देख कर, तेरे गीत मे कही विलुप्त हो गया था...
तेरे नैनो जब देखा मेरे नेत्रो मे, हृदय मे आकर्षकता का अहसास हो गया था....
स्मित अधर ने जब गया अपना गीत, सुनकर स्थिर हो गया था...
सुनकर तेरा मधुर, मनमोहक, मादक गीत-संगीत, सम्मोहन मे चला गया था....
रेशम के से तेरे केश, गीत-संगीत से शर्मा कर बिखर गये थे....
स्मित मुख से निकला एक-एक मिष्ठ स्वर, भावबोधक हो गया था....
साज़ ढकने का वस्त्र भी, नृत्या की मुद्रा मे पहुँच गया था....
हृदय मे तुझे आलिंगन करने का संकोच भरा अहसाह आ गया था....
ये छोटा सा समय, मानो मेरे जीवन का सबसे अनमोल हो गया था...
आकर्षणशीलता, मनमोहकता, मनोहरता, सुहावनापन सब कुछ महसूस किया था....
तू मेरे जीवन का सबसे मधुर अहसास है,
तभी तूने मृदुला मादक स्वर, आकर्षक अधर, मनमोहक योवन पाया है ,
संगीत-स्वर् और सौन्दर्य का एक साथ संगम, प्रथम बार पाया है !!!!!!!!
___दीपक पांचाल___

Friday, September 16, 2011

!! रिम झिम ये बरसात होने लगी...फिर से तेरी याद आने लगी !!



इस बरसात ने आज फिर तेरी याद दिला दी...
इस रिम झिम, ने मेरे ह्रदया मे तबले की ताल बजा दी...
इस बरसात के झरने ने, आज फिर से तेरे खूबसूरत से चहरे की याद दिला दी...
एक एक बूँद जो तेरे बदन से छू कर गिरती है..
हर एक बूँद किसी सच्चे मोती के जैसे नज़र आ रहे हैं....
तेरा भीगा बदन, किसी भीगे गुलाब के जैसा दिखता है....
कोई बूँद अगर गुलाब पे ठहर जाती है.. तो अमृत बन जाती है ...
भीगे हुए, तर्रए से, होंठ किसी गुलाब की पंखुड़ी से लगते हैं ....
कहने को तो ये बरसात है, परंतु मेरे लिए एक मनमोहक अहसास है...
एक अजीब सी सरसराहट होती है.. जब तुम अपनी मदमस्त पलके बंद करती हो...
तेरे भीगे बाल, मेरी तड़प और बढ़ा रहे हैं, दिल मतवाला हो उठा है.....
मंन मचल मचल जाता है.. तुझे छूने को दिल होता है...
तेरी हर एक अंगड़ाई पे, असमान की बिजली भी कड़क जाती है.....
जो तुझे छू कर बूँद आई है...उस हर एक बूँद को पीने का दिल करता है..
सच मे ये बरसात.. मदहोश कर देती है.. जब जब तुझे भीगते हुए देखता हूँ...
फिर से ये रिम झिम बरसात होने लगी...फिर से तेरी याद आने लगी...
___दीपक पांचाल____

Thursday, September 1, 2011

!! मेरा बचपन !!




किसी मासूम से चेहरे को 
जब देखता हूँ .....
मुझे याद आता है, 
वो मदमस्त बचपन .....
हर एक मासूम के मन को
अपने अंदर देखता हूँ .....
किसी पेड़ के नीचे बैठकर,
व्यस्त जीवन से भागकर ......
खोए हुए बचपन को दोबारा
जीने की चाह देखता हूँ .....
मेरा बचपन.... मेरा बचपन
नवनिर्मित मकान की 
खुदी हुए नींव मे 
छुपम छुपाई खेलना .....
या फिर, रेत के ढेर मे 
गुफा बना कर खेलना ......
रेलगाड़ी की पटरी पे 
सिक्के रखना,
समझना, 
सिक्का चुंबक बनेगा ....
कितना मासूम था 
मेरा बचपन,
कितना सच्चा था
मेरा बचपन.....
जिंदगी की भाग दौड़ का 
अहसाह ह्रदया मे ना था ......
अमरूद के पत्तो का
पान बनाकर,
पनवाडी बनना हो....
या फिर, रामलीला मैदान में
सबसे आगे 
बैठने की होड़ लगाना.....
मास्टर जी को देख कर, 
किसी गली मे छुप जाना ....
किसी कटी हुई पतंग के
पीछे दौड़ लगाना .....
तेज धूप वाली दोपहर मे,
पड़ोसी के आँगन से 
अमरूद चुराकर खाना ....
कितना सच्चा और 
प्यारा सा बचपन,
वो सब करना
जो हर मासूमहै
बचपन करता
मेले मे जाकर 
कठपुतली का नाच 
देखकर तालियाँ बजाना....
मदारी के पास खड़े हो कर,
बंदर को तंग करना.
बरसात के पानी मे
भीग कर,
कागज की नाव 
चलाना चाहता हूँ मैं
आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
आज हर कीमत को 
अदा करने को तैयार हूँ.मैं 
क्या कोई 
मेरा बचपन लौटा सकता है
प्यारी माँ के
आँचल मे छुपकर,
दुनिया के शोरगुल से हटकर
बस कुछ पल,
चैन की नींद लेना चाहता हूँ.
खिलखिलाकर हँसना
चाहता हूँ मैं
आज कुछ पाना चाहता हूँ....
आज अपना बचपन 
जीना चाहता हूँ मैं
बस आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
(दीपक पांचाल)

Tuesday, August 30, 2011



!! मन मोहिनी सी लगती हो आप !!



मन मोहिनी सी लगती हो आप...
 चंद्रमा की चाँदनी सी लगती हो आप...
 गुलाब सी की महक लगती हो आप....
 बरसात की बूँद लगती हो आप...
 सुबह की नन्ही ओस सी लगती हो आप...
 दिल्ली की सर्दी लगती हो आप...
 बसंत की बाहर लगती हो आप...
 रसगुल्ले का रस लगती हो आप...
 तबले की ताल लगती हो आप....
 किसी कवि की कविता लगती हो आप....
 तभी इतनी खूबसूरत सी दिखती हो आप....
दिल के करीब लगती हो आप....

(दीपक पांचाल)

!! मैं एक कवि हूँ !!

मैं एक कवि हूँ, 
अपने विचार-धारा को कलम से काग़ज़ के पन्नो पे लिखता हूँ ! 
मैं बार बार लिखता हूँ, सीधे ह्रदया पे लिखता हूँ ! 
ह्रदया पे लिखता हूँ, दिमाग़ पे लिखता हूँ ! 
एक प्रेमी के सोचने का ढंग लिखता हूँ ! 
प्रेमिका की मुस्कान लिखता हूँ ! 
मैं कभी , एक ग़रीब की सचाई लिखता हूँ ! 
तो कभी एक अमीर का दर्द लिखता हूँ ! 
मैं मुखहोटे के पीछे असली चेहरे को लिखता हूँ ! 
मैं कभी किसी मा का लाल लिखता हूँ ! 
तो कभी, किसी की बेटी के दास्तान लिखता हूँ ! 
मैं बंदूक की गोली लिखता हूँ ! 
तो कभी, किसी के सिंदूर की कीमत लिखता हूँ ! 
मैं ज़मीन लिखता हू, आसमान लिखता हूँ ! 
मैं कभी आग लिखता हूँ, तो कभी पानी की बोछर लिखता हूँ ! 
अपनी कलम से बस सचाई लिखता हूँ ! 
सोते जागते "मेरा भारत महान" लिखता हूँ ! 
_____जय हिंद_____ 
___(दीपक पांचाल___

!! एक अनदेखी, अंजानी सी सूरत !!




एक अनदेखी, अंजानी सी सूरत हरदया मे बसाए बैठा हूँ ...
कभी कविता, तो कभी ग़ज़ल उसके लिए कहता हूँ ....
तन्हाई तुम आकर बिखेर तो मेरी, मैं पलके बिछाए बैठा हूँ ....
तेरी मनमोहिनी, मदमस्त, मतवाली नैनो मैं अपनी छाया को देखता हूँ.....
एक हसरत है, पता है पूरी नही होगी, फिर भी आस लगाए बैठा हूँ.....
कहीं तुम नज़र आ जाओ चाँद मैं, इसलिए चाँदनी पे टकटकी लगाए बैठा हूँ ....
नन्ही ओस की बूँद मे आपको देखता हूँ, तो कभी गुलाब को हाथो मे लिए बैठा हूँ....
खूबसूरती जो तुमने पाई है, उसको को एक चित्र मे संजोए बैठा हूँ ....
पता है की सपने सच नही होते, रातो को जाग जाग के तेरी उम्मीद लगाए बैठा हूँ...
तुझे अपना एक नाम देना चाहता हू...इसलिए हाथ मे कलम लिए बैठा हूँ...

(दीपक पांचाल)