Thursday, September 22, 2011

!! आप की हर बात, अपने आप मे एक बात है !!

आप की हर बात, अपने आप मे एक बात है,
पढ़ता रहूं आपको, मेरे लिए बहुत बड़ी बात है!!
जिंदगी गुजार दूं, आपके शब्दो के साथ,
ये एक बड़े ही राज की बात है !!

___कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

!! एक ख़ास अहसाह नज़र आता है, आपकी आँखो मे !!

एक ख़ास अहसाह नज़र आता है, आपकी आँखो मे,
बस आपका ही इंतज़ार रहता है, हमारी आँखो मे !

तुम्हारा पर्तिबिम्ब नज़र आता है, देखो मेरी आँखो मे,
सारी खूबसूरती आप से है, बस, ठहर जाओ, मेरी आँखो मे !

एक अनदेखा सा, अहसास दिखता है, जब देखु आपकी आँखो मे,
आप मान मुझे जो इतना दे रहे हो, दिखाई देता है आपकी आँखो मे !

___कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

!! ना तू, इकरार करती ह, !ना तू इनकार ही करती है !!

ना तू हाँ करती है,
ना तू ना करती है!
तुझे ना समझ पाया कभी,
तू ये क्यो करती हैं!
उलझा हूँ, तेरी अदओ मे,
तू ऐसा क्या करती है!
कसक है तेरी, हर हरकत मे,
तू हमेशा, ऐसा ही करती है!
शबनम टपकती, तेरी, हर मुस्कान पे,
तू ये जानबूझकरम ऐसा करती है!
देख कर मुझे, अंगड़ाई लेती है,
मुझे देखकर ही तू, ये सब करती है!
तडपा कर रख दिया, तूने मुझे,
सच-सच बता, क्या तू, मुझसे प्यार करती है!!
ना तू, इकरार करती है,
ना तू इनकार ही करती है !!

____कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)___

Wednesday, September 21, 2011

!! रात, मैं तुम्हारे साथ था !!


रात भर, मैं सो ना पाया,
महसूस करता रहा,
तुम्हारी खूबसूरत, मनभावन, निर्मल काया !
तुम पास थी मेरे, 
कभी तुम मुस्कराती,
कभी तुम अपनी आँखें दिखती !
कभी तुम मुझसे बातें करती,
तो कभी, अचानक से, मेरे बालो को सहलाती!
कभी तुम मुझे छेड़ती,
तो कभी, अपनी अदा की छटा बिखेरती!
कभी तुम, अपने पैरो से, मेरे पैरो पे गुदगुदी करती,
तो कभी, अचानक से, अपने बालो से मेरा चेहरा ढक देती !
तुम मेरे कंधे पर, अपने आप को गिरा,
तो कभी, मेरे गले मे, अपनी बाहें डाल, झूल जाती! 
कभी तुम, अपनी अंगड़ाई से, मुझे पास बुलाती,
तो कभी, मुस्करा कर, मुझसे दूर भाग जाती!
कभी तुम, मेरे सीने पे अपना सिर रखती,
तो कभी, मेरे सीने पे अपने, अधर रख देती !
कभी, मेरी आँखो मे, अपनी आँखो डाल, देखती,
ती कभी, तुम्हारी पलके, कोमलता से शरमा जाती !
कभी तुम, मुझे अपने मदहोश आलिंगन मे बाँध लेती,
तो कभी, अपने मीठे अधरो का रस, मेरे होंठो मे भर देती!
कभी तुम, मेरी करवट के साथ, अपनी करवट लेती,
तो कभी, मेरा सिर पकड़, अपने आँचल पे रख देती !


तुम्हारा एक एक अंदाज, मुझमे चेतना भर रहा है,
सुबह हो चली है___ आज रात जल्दी ख़त्म हो गयी!
मैं उठने को हूँ, 
अचानक से तुमने मेरा हाथ पकड़ा, 
तुम्हारे मुख से निकला, रुक जाओ ना,
अभी तो आए थे, अभी चल दिए !


__दीपक पांचाल___

















Tuesday, September 20, 2011

!! हमारी चाहत की दुनिया मे, आपका स्वागत है !!



हुस्न-ए-आलिया__
हमारी चाहत की दुनिया मे, आपका स्वागत है !
ज़ोरदार तालियो के साथ, आपका स्वागत है !
पुलकित, हर्षित हृदय से, आपका स्वागत है !
स्वागत करता हूँ, आपकी मनमोहकता का,
आपकी खिलखिलाहट का भी स्वागत है !
चमेली की खुश्बू से, चंद्रमा की चाँदनी से,
पक्षियो के संगीत से, आपका स्वागत है !
आपके लुभावने रूप, रसीले अधर,
मदमस्त नैनो का, बार बार स्वागत है!
आपकी व्यसनी अंगड़ाई, घने गेसू,
इठलाती-बलखती लचकती, चाल का भी स्वागत है!
ऑश की नन्ही बूँदो से, महकते गुलाबो से,
सुरीली कोयल के गीतो से, आपका स्नेह भरा स्वागत है!
आपकी चूड़ियो की खनखनाहट, कजरे की बनावट,
झूमको का, पायल की छनछनाहट का, बार बार स्वागत है!
आपका बार बार स्वागत है, हर बार स्वागत है !
आपका ज़ोरदार, हार्दिक स्वागत है !
अपनी कलम की लेखनी से, आपका हार्दिक स्वागत है!!


___दीपक पांचाल___

Sunday, September 18, 2011

!! मृदु संगीत-स्वर् और सौन्दर्य का एक साथ संगम !!




मृदुला अधर से स्वर निकला तो, अचानक से अधीर हो गया था...
बजाया जब तूने साज़, संगीत मे विभोर हो गया था....
तेरे आकर्षक नैनन मे मदहोश हो कर डूब गया था...
तेरे मनमोहक मुख को निहार कर मंत्रमुग्ध हो गया था..
तेरे लुभावने अधर को देख कर, तेरे गीत मे कही विलुप्त हो गया था...
तेरे नैनो जब देखा मेरे नेत्रो मे, हृदय मे आकर्षकता का अहसास हो गया था....
स्मित अधर ने जब गया अपना गीत, सुनकर स्थिर हो गया था...
सुनकर तेरा मधुर, मनमोहक, मादक गीत-संगीत, सम्मोहन मे चला गया था....
रेशम के से तेरे केश, गीत-संगीत से शर्मा कर बिखर गये थे....
स्मित मुख से निकला एक-एक मिष्ठ स्वर, भावबोधक हो गया था....
साज़ ढकने का वस्त्र भी, नृत्या की मुद्रा मे पहुँच गया था....
हृदय मे तुझे आलिंगन करने का संकोच भरा अहसाह आ गया था....
ये छोटा सा समय, मानो मेरे जीवन का सबसे अनमोल हो गया था...
आकर्षणशीलता, मनमोहकता, मनोहरता, सुहावनापन सब कुछ महसूस किया था....
तू मेरे जीवन का सबसे मधुर अहसास है,
तभी तूने मृदुला मादक स्वर, आकर्षक अधर, मनमोहक योवन पाया है ,
संगीत-स्वर् और सौन्दर्य का एक साथ संगम, प्रथम बार पाया है !!!!!!!!
___दीपक पांचाल___

Friday, September 16, 2011

!! रिम झिम ये बरसात होने लगी...फिर से तेरी याद आने लगी !!



इस बरसात ने आज फिर तेरी याद दिला दी...
इस रिम झिम, ने मेरे ह्रदया मे तबले की ताल बजा दी...
इस बरसात के झरने ने, आज फिर से तेरे खूबसूरत से चहरे की याद दिला दी...
एक एक बूँद जो तेरे बदन से छू कर गिरती है..
हर एक बूँद किसी सच्चे मोती के जैसे नज़र आ रहे हैं....
तेरा भीगा बदन, किसी भीगे गुलाब के जैसा दिखता है....
कोई बूँद अगर गुलाब पे ठहर जाती है.. तो अमृत बन जाती है ...
भीगे हुए, तर्रए से, होंठ किसी गुलाब की पंखुड़ी से लगते हैं ....
कहने को तो ये बरसात है, परंतु मेरे लिए एक मनमोहक अहसास है...
एक अजीब सी सरसराहट होती है.. जब तुम अपनी मदमस्त पलके बंद करती हो...
तेरे भीगे बाल, मेरी तड़प और बढ़ा रहे हैं, दिल मतवाला हो उठा है.....
मंन मचल मचल जाता है.. तुझे छूने को दिल होता है...
तेरी हर एक अंगड़ाई पे, असमान की बिजली भी कड़क जाती है.....
जो तुझे छू कर बूँद आई है...उस हर एक बूँद को पीने का दिल करता है..
सच मे ये बरसात.. मदहोश कर देती है.. जब जब तुझे भीगते हुए देखता हूँ...
फिर से ये रिम झिम बरसात होने लगी...फिर से तेरी याद आने लगी...
___दीपक पांचाल____

Thursday, September 1, 2011

!! मेरा बचपन !!




किसी मासूम से चेहरे को 
जब देखता हूँ .....
मुझे याद आता है, 
वो मदमस्त बचपन .....
हर एक मासूम के मन को
अपने अंदर देखता हूँ .....
किसी पेड़ के नीचे बैठकर,
व्यस्त जीवन से भागकर ......
खोए हुए बचपन को दोबारा
जीने की चाह देखता हूँ .....
मेरा बचपन.... मेरा बचपन
नवनिर्मित मकान की 
खुदी हुए नींव मे 
छुपम छुपाई खेलना .....
या फिर, रेत के ढेर मे 
गुफा बना कर खेलना ......
रेलगाड़ी की पटरी पे 
सिक्के रखना,
समझना, 
सिक्का चुंबक बनेगा ....
कितना मासूम था 
मेरा बचपन,
कितना सच्चा था
मेरा बचपन.....
जिंदगी की भाग दौड़ का 
अहसाह ह्रदया मे ना था ......
अमरूद के पत्तो का
पान बनाकर,
पनवाडी बनना हो....
या फिर, रामलीला मैदान में
सबसे आगे 
बैठने की होड़ लगाना.....
मास्टर जी को देख कर, 
किसी गली मे छुप जाना ....
किसी कटी हुई पतंग के
पीछे दौड़ लगाना .....
तेज धूप वाली दोपहर मे,
पड़ोसी के आँगन से 
अमरूद चुराकर खाना ....
कितना सच्चा और 
प्यारा सा बचपन,
वो सब करना
जो हर मासूमहै
बचपन करता
मेले मे जाकर 
कठपुतली का नाच 
देखकर तालियाँ बजाना....
मदारी के पास खड़े हो कर,
बंदर को तंग करना.
बरसात के पानी मे
भीग कर,
कागज की नाव 
चलाना चाहता हूँ मैं
आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
आज हर कीमत को 
अदा करने को तैयार हूँ.मैं 
क्या कोई 
मेरा बचपन लौटा सकता है
प्यारी माँ के
आँचल मे छुपकर,
दुनिया के शोरगुल से हटकर
बस कुछ पल,
चैन की नींद लेना चाहता हूँ.
खिलखिलाकर हँसना
चाहता हूँ मैं
आज कुछ पाना चाहता हूँ....
आज अपना बचपन 
जीना चाहता हूँ मैं
बस आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
(दीपक पांचाल)