किसी मासूम से चेहरे को
जब देखता हूँ .....
मुझे याद आता है,
वो मदमस्त बचपन .....
हर एक मासूम के मन को
अपने अंदर देखता हूँ .....
किसी पेड़ के नीचे बैठकर,
व्यस्त जीवन से भागकर ......
खोए हुए बचपन को दोबारा
जीने की चाह देखता हूँ .....
मेरा बचपन.... मेरा बचपन
नवनिर्मित मकान की
खुदी हुए नींव मे
छुपम छुपाई खेलना .....
या फिर, रेत के ढेर मे
गुफा बना कर खेलना ......
रेलगाड़ी की पटरी पे
सिक्के रखना,
समझना,
सिक्का चुंबक बनेगा ....
कितना मासूम था
मेरा बचपन,
कितना सच्चा था
मेरा बचपन.....
जिंदगी की भाग दौड़ का
अहसाह ह्रदया मे ना था ......
अमरूद के पत्तो का
पान बनाकर,
पनवाडी बनना हो....
या फिर, रामलीला मैदान में
सबसे आगे
बैठने की होड़ लगाना.....
मास्टर जी को देख कर,
किसी गली मे छुप जाना ....
किसी कटी हुई पतंग के
पीछे दौड़ लगाना .....
तेज धूप वाली दोपहर मे,
पड़ोसी के आँगन से
अमरूद चुराकर खाना ....
कितना सच्चा और
प्यारा सा बचपन,
वो सब करना
जो हर मासूमहै
बचपन करता
मेले मे जाकर
कठपुतली का नाच
देखकर तालियाँ बजाना....
मदारी के पास खड़े हो कर,
बंदर को तंग करना.
बरसात के पानी मे
भीग कर,
कागज की नाव
चलाना चाहता हूँ मैं
आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
आज हर कीमत को
अदा करने को तैयार हूँ.मैं
क्या कोई
मेरा बचपन लौटा सकता है
प्यारी माँ के
आँचल मे छुपकर,
दुनिया के शोरगुल से हटकर
बस कुछ पल,
चैन की नींद लेना चाहता हूँ.
खिलखिलाकर हँसना
चाहता हूँ मैं
आज कुछ पाना चाहता हूँ....
आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
बस आज अपना बचपन
जीना चाहता हूँ मैं
(दीपक पांचाल)

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