Thursday, October 20, 2011

!!भयानक काली रात, आपके प्यार का साथ!!

हर रोज की तरह साझ, ढली,
अंधेरे की चादर, धरा ने ओढ़ ली,
भयानक सी काली, अंधेरी रात मे,
मैं हूँ किसी अपने के इंतजार मे,
चारो ओर फैला सन्नाटा है,
एक अजीब सा डरावना अहसास है,
आँखे टिकी हैं, आँगन के फाटक पे,
तो कभी, टिकती हैं,
घर के अंदर जल रहे तेल के दीये पे,
वक़्त की गति, मानो यहीं थम सी गयी है,
अब मेरी चिंता, मानो बढ़ सी गयी हैं,
आकाश मे बिजली कडकने लगी है,
ये रात और, खोफ़नक होने लगी है,
तेज बरसात का शोर बढ़ने लगा हैं,
मुझे ओर ज़्यादा डर लगने लगा है,
अकेलेपन का अहसास होने लगा है,
घर मे जल रहे तेल के दिये का सहारा है,
अब दिये की रोशनी भी, किनारा कर रही है,
दिये ने साथ छोड़ दिया,
मुझे बेबस सा कर दिया,
अचानक फाटक खुलने की आवाज़ आई,
अपने किसी के आने की, महक सी आई,
आप आ गये हो,
मानो इस भयानक रात से,
अब कोई डर नही रहा,
मन मे खुशी का ठिकाना नही रहा,
आप से लिपटकर, कंधे पर सिर रखा,
भीगे शरीर से पानी,
जैसे मैने अपने शरीर मे सोख लिया हो,
आपके होटो से आ रही गरम सांस,
मेरे कानो मे आपके होने का अहसास दे रही है,
आपके आने से मानो,
ये काली, अंधेरी, भयानक रात,
मेरे लिए सुहवनी बन गयी है,
मैं सुरक्षित हूँ, आपके साथ हूँ,
मैं केवल ओर केवल तुम्हारी हूँ,
बस सदा मेरे आँचल मे,
आप मेरे करीब होने का अहसास देते रहो,
मैने हर लम्हा आपको,
चाहत से भी ज़्यादा चाहा है,

__कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)__



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