चाहत चाहत को मिला देती है,
तकदीर का खेल निराला है,
ये कहाँ से कहाँ..मिला देती है,
जब मिले कोई चाहने वाला,
ये अपने आप मिला देती है !!
_कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)_
तकदीर का खेल निराला है,
ये कहाँ से कहाँ..मिला देती है,
जब मिले कोई चाहने वाला,
ये अपने आप मिला देती है !!
_कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)_
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