सनसनी सी फैल गयी,
आने से तुम्हारे,
मेरे लबों की जैसे,
मुस्कान लौट हो आई,
केवल आने से तुम्हारे,
नन्ही ऑश हो तुम,
गुलाब की पंखुड़ी पे देखा मैने,
जैसे शर्मयी हुई हो तुम बैठी,
वर्षा की बूँद हो तुम,
गीली मिट्टी पे देखा मैने,
जैसे ये मादक महक तुमने हो फैलाईं,
रात की चाँदनी हो तुम,
गिरते हुए झरने पे देखा मैने,
जैसे चाँदी सामान बौछार तुमने हो फैलाईं,
शांत शीतल लहर हो तुम,
बहते हुए तुम्हे देखा मैने,
जैसे अपनी छुवन से सारी सिरहन तुमने हो फैलाईं,
मेरी शायरी हो तुम,
शब्दो के साथ तुम्हे देखा मैने,
जैसे मेरी कल्पना के अहसास तुमने हो फैलाईं!!
_ © कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)_
आने से तुम्हारे,
मेरे लबों की जैसे,
मुस्कान लौट हो आई,
केवल आने से तुम्हारे,
नन्ही ऑश हो तुम,
गुलाब की पंखुड़ी पे देखा मैने,
जैसे शर्मयी हुई हो तुम बैठी,
वर्षा की बूँद हो तुम,
गीली मिट्टी पे देखा मैने,
जैसे ये मादक महक तुमने हो फैलाईं,
रात की चाँदनी हो तुम,
गिरते हुए झरने पे देखा मैने,
जैसे चाँदी सामान बौछार तुमने हो फैलाईं,
शांत शीतल लहर हो तुम,
बहते हुए तुम्हे देखा मैने,
जैसे अपनी छुवन से सारी सिरहन तुमने हो फैलाईं,
मेरी शायरी हो तुम,
शब्दो के साथ तुम्हे देखा मैने,
जैसे मेरी कल्पना के अहसास तुमने हो फैलाईं!!
_ © कवि दीपक दीप (दीपक पांचाल)_

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