एक अनदेखी, अंजानी सी सूरत हरदया मे बसाए बैठा हूँ ...
कभी कविता, तो कभी ग़ज़ल उसके लिए कहता हूँ ....
तन्हाई तुम आकर बिखेर तो मेरी, मैं पलके बिछाए बैठा हूँ ....
तेरी मनमोहिनी, मदमस्त, मतवाली नैनो मैं अपनी छाया को देखता हूँ.....
एक हसरत है, पता है पूरी नही होगी, फिर भी आस लगाए बैठा हूँ.....
कहीं तुम नज़र आ जाओ चाँद मैं, इसलिए चाँदनी पे टकटकी लगाए बैठा हूँ ....
नन्ही ओस की बूँद मे आपको देखता हूँ, तो कभी गुलाब को हाथो मे लिए बैठा हूँ....
खूबसूरती जो तुमने पाई है, उसको को एक चित्र मे संजोए बैठा हूँ ....
पता है की सपने सच नही होते, रातो को जाग जाग के तेरी उम्मीद लगाए बैठा हूँ...
तुझे अपना एक नाम देना चाहता हू...इसलिए हाथ मे कलम लिए बैठा हूँ...
(दीपक पांचाल)

bahut khoob....
ReplyDeletesundar bhawo ki abhiyakti ,,,ajnabi kaun hai wo jra ham bhi to jane,,,mile to bta dijiyega,,
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